Friday, April 1, 2011

एक राजस्थानी कविता

खबर

कवरेज सूं बावड़ती थकां

आपूंआप इज होग्यी सांझ माथै

सुणुं हूं कलरव

चिड़कल्यां रो चै‘चाणो

अर

कोसूं हूं खुद नैं

खबरनवीस होवणै सारू

क्यूं‘कै चिड़ियावां रो चै‘चाणो

जाबक इज अरथ नीं राखै

अखबारां सारू।

हां, आपां छापां

चिड़ियावां नैं प्रमुखता सूं

जद कै वां रो चै‘चाणो

दबोच-खसोट लियो जावै,

जद वां रो कलरव

मसळ्यो- कुचळ्यो जावै

कै फेरूं

इण जंगल रै नैमां रो

खासो जाणकार

कोयी सिकारी

चिड़ियावां रै चे‘चाट नै

बदळ देवै

छेकड़लै चीत्कार मांय।

(कुमार अजय)


Thursday, March 31, 2011

कोई टाटा-बिड़ला नहीं थे दादाजी

कोई टाटा-बिड़ला नहीं थे दादाजी

गांव के एक साधारण से आदमी थे

और खेती-बाड़ी, मेहनत-मजदूरी कर गुजारा करते थे

बनिये ने जब गांव में धर्मशाला बनवाई

चौधरी ने कुआ खुदवा दिया

ठाकुर ने मंदिर बनवा दिया

और डिप्टी साहब ने स्कूल में कमरे बनवा दिये

ठीक उन्हीं दिनों में दादाजी ने

गांव के गुवाड़ में एक बड़ का पेड़ लगाया।

पंद्रह अगस्त-छब्बीस जनवरी हो

या दूसरा कोई मौका

जब गांव में कोई कार्यक्रम होता

बनिया, ठाकुर, डिप्टी और चौधरी

बड़ी शान से बैठते थे वहां

और दूसरे सब लोग उन चारों की बड़ी सराहना करते थे

दादाजी भी उसी माठ से बैठते थे

अपने लगाए उस छोटे से दरख्त के पास

लेकिन दादाजी को कभी किसी ने उस तरह नहीं सराहा।

जीण-शीर्ण हुई उस धर्मशाला के पास अब सरकार ने

एक बड़ा सामुदायिक भवन बनवा दिया है

हर मौहल्ले में कुए खुद गए हैं

लेकिन उस बोड़िये कुए में पानी नहीं आता अब

अलबत्ता कचरा जरूर डालते हैं उसमें

आसपास के लोग

स्कूल में इतने बड़े-बड़े हॉल बने हैं

कि लगता ही नहीं

कि डिप्टी साहब के बनवाए कमरे की

कोई जरूरत रही भी होगी यहां।

मंदिर भी अब छोटा और पुराना पड़ गया है

कई बड़े मंदिर जो बन गए हैं

वैसे में मंदिरों में अब कोई आता-जाता नहीं

उस भूतहा मंदिर में तो कोई भी नहीं।

इधर

धर्मशाला, कुए, मंदिर

और स्कूल के कमरे की तरह

कतई अप्रासंगिक नहीं हुआ बड़ का वह पेड़

और न ही कोई दूसरा पेड़

उसे बौना कर पाया

वह आज भी खड़ा है गुवाड़ में

अपनी बांहों के रोज बढते फैलाव के साथ

जैसे खड़े हों दादाजी

हां, वही दादाजी

जो कोई टाटा-बिड़ला नहीं थे

गांव के एक साधारण से आदमी थे।

(कुमार अजय)

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Tuesday, March 22, 2011

राजस्थानी काव्य संग्रह ‘संजीवणी’ का विमोचन

चूरू। साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से प्रकाशित कुमार अजय के कविता संग्रह ‘संजीवणी का विमोचन पांच फरवरी 2011 चूरू के सूचना केंद्र में प्रयास संस्थान की ओर से आयोजित समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार एवं साहित्य अकादेमी में राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के संयोजक पद्मश्री डॉ चंद्रप्रकाश देवल ने किया।

इस मौके पर डॉ देवल ने कहा कि साहित्यकार का मन समाज की दशा और दिशा पर पसीजता है, झुलसता है और रोता है, तब किसी रचना की उत्पत्ति होती है। विसंगतियों और विद्रूपताओं को देखकर साहित्यकार चुप नहीं रह सकता है। वह किसी फायदे के लिए नहीं लिखता है, यही कारण है कि समाज में साहित्यकार को युगों-युगों तक याद किया जाता है। उन्होंने सुकरात और पाणिनी का उदाहरण देते नए रचनार्धमियों को हिदायत दी कि प्रत्येक परिस्थिति में सच, नीति और न्याय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजस्थानी में किसी भी नई रचना और पोथी को देखकर उनका खून बढता है। उन्होंने कहा कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ भाषाविद् सुनीति कुमार चाटुज्र्या ने राजस्थानी को उत्कृष्ट भाषा माना था। राजस्थानी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भाषा है और हर दृष्टिकोण से पात्र होने के बाद भी राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव में हम अपनी मायड़ भाषा की मान्यता के लिए तरस रहे हैं। उन्होंने कहा कि राजस्थानी की मान्यता हमारी अस्मिता का सवाल है और लोकतंत्र का तकाजा है। उन्होंने कहा कि आजादी की जंग में राजस्थान ने अगणित योद्धा दिए हैं। आजादी के बाद भी देश की हिफाजत के लिए शहीद होने वाले लोगों में सर्वाधिक संख्या राजस्थानियों की है, फिर भाषा की मान्यता के नाम पर हमें पीछे क्यों धकेला जाता है। उन्होेंने कहा कि राजस्थान के लोगों ने अपने आत्मोत्सर्ग से वीर रस को अभिव्यक्ति दी है, ऎसा उदारहण दुनिया की किसी दूसरी भाषा में नहीं मिलता। डॉ देवल ने बांकीदास द्वारा 1810 में लिखी गई ‘आयो अंगरेज मुलक रे ऊपर का उदाहरण देते हुए कहा कि सबसे पहले राजस्थानी साहित्य ने अंग्रेजों की गुलामी के विरूद्ध आजादी का बिगुल बजाया था। इससे पहले किसी भी भाषा के साहित्य में ऎसा दृष्टांत नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि साहित्यकार को हमेशा यह आत्मविश्लेषण करना चाहिए कि वह क्यों लिखता है। यह दृष्टि उसके लेखन को समाज हित के लिए उपयोगी बनाए रखेगी।

डॉ मुमताज अली की अध्यक्षता में हुए कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रख्यात साहित्यकार त्रिभुवन ने कहा कि पाकिस्तान सहित दुनिया के कई देशों में राजस्थानी बोली जाती है और राजस्थानी का साहित्य बड़ा ही अद्भुत है। उन्होंने कहा कि राजस्थानी के शब्दों की अभिव्यक्ति क्षमता देखकर दुनिया भर के भाषाविद चकित रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि राजस्थान के लोगों और राजनेताओं को राजस्थानी की मान्यता का संकल्प लेना होगा।

वशष्टि अतथि िअतरिक्ति कलक्टर बी एल मेहरड़ा ने उम्मीद जताई कि शीघ्र ही राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची मे मान्यता मिल जाएगी। चूरू प्रधान रणजीत सातड़ा ने कहा कि राजस्थानी की मान्यता के लिए युवाओं को आगे आना चाहिए।

विमोचित पुस्तक की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए युवा साहत्यिकार राजीव स्वामी ने कहा कि ‘संजीवणी एक रचनाकार के निजी संघर्षों और कड़वे-मीठे अनुभवों का सार्वजनिक बयान है। उन्होंने कहा कि अजय की प्रत्येक रचना कवि की उसके परिवेश के प्रति चौकन्नी नजर की परचिायक है। उन्होंने कवि की आत्मालोचनात्मक दृिष्ट की सराहना करते हुए कहा कि संग्रह की प्रेम कविताएं प्रेम के व्यापक स्वरूप को उद्घाटित करती हैं।

अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रयास संस्थान के संरक्षक भंवर सिंह सामौर ने कहा कि कुमार अजय की पहली ही पुस्तक की रचनाओं में काफी परिपक्वता दिखाई दे रही है। बैजनाथ पंवार ने आभार जताया। प्रयास के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने अतिथियों का परिचय दिया।

इस मौके पर मुख्य अतिथि डॉ देवल को हाल में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान की घोषणा के उपलक्ष्य में साफा बांधकर व शॉल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह व मान पत्र देकर सम्मानित किया गया। विभिन्न संस्थाओं की ओर से डॉ देवल का स्वागत किया गया। कार्यक्रम का संचालन कमल शर्मा ने किया।

इस दौरान सहायक जनसंपर्क निदेशक राजकुमार पारीक, सुरेंद्र पारीक रोहित पीआरओ रामप्रसाद शर्मा, रामगोपाल बहड़, दुलाराम सहारण, हरिसिंह सहारण, श्याम सुंदर शर्मा, माधव शर्मा, सुनीता दादरवाल, शबाना शेख, महावीर नेहरा, नारायण कुमार मेघवाल सहित बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, साहित्यकार, पत्रकार एवं नागरिक मौजूद थे।

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Sunday, January 30, 2011

एक पुरानी ग़ज़ल

खुद को जैसे जानता नहीं...

दूर हूं तुमसे, जुदा नहीं मगर
हां उदास तो हूं खफा नहीं मगर।

हजारों बरस से साथ हूं अपने
खुद को जैसे जानता नहीं मगर।

उसे बेवफा कहा, समझाया लाख
दिले-नादां बहलता नहीं मगर।

हर बार मरके संभला किया हूं
अंजाम मेरा बदला नहीं मगर।

इश्क से पहले बहुत सोच के भी
दिल ने कुछ भी सोचा नहीं मगर।

जैसे खुदा ही मेरा रकीब थानाजुक
रोया खूं, उसने देखा नहीं मगर।
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Tuesday, January 18, 2011

गौरव की निगाहें अब एकोन्कागुआ की ओर


माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा लहराने वाले राजस्थान के पहले सिविलियन और चूरू के लाडले गौरव शर्मा की निगाहें अब दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर माउंट एकोन्कागुआ की ओर हैं। विश्व के सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची पहाड़ी चोटियों पर तिरंगा फहराने के ख्वाहिशमंद गौरव संभवतः इस वर्ष मार्च में 23 हजार 834 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस पर्वत शिखर पर कदम रख चुके होंगे।

गौरव के मुताबिक, दुनिया के सबसे बड़े सांप एनाकोंडा के लिए मशहूर अर्जेंटीना के इस पर्वत शिखर पर चढाई के लिए मार्च से लेकर जून तक का मौसम सबसे बेहतर माना जाता है। वे इस सीजन की शुरुआत में ही इस अभियान को पूरा करने के मूड में हैं। रॉक्स की बहुतायत के कारण एकोन्कागुआ में आरोहण के लिए ज्यादातर रॉक क्लांइंबिंग के सहारे ही चढाई संभव होगी। चट्टानों की अधिकता से फिसलन के खतरे के चलते भी यह चढाई खासी चुनौतीपूर्ण रहेगी। इससे पहले गौरव को दलदली और कीचड़ भरे रास्ते से गुजरना होगा। गौरव बताते हैं कि वहां वातावरण अनुकूलन में भी थोड़ी परेशानी आ सकती है क्योंकि हिमालय की बजाय वहां की परिस्थितियां कुछ अलग हैं और ऑक्सीजन की मात्रा का प्रतिशत भी कम है। इन सब मुश्किलों के बावजूद गौरव के मन में कोई घबराहट, कोई बैचेनी नहीं क्योंकि गौरव को अपने हौंसले और शुभचिंतकों की दुआओं पर पूरा भरोसा है। फिर साउथ अ अफ्रीका के सबसे ऊंचे पर्वत किलीमिंजारो में उनके हमसफर रहे जयपुर के युवा साथी हरनाम सिंह इस बार भी उनके साथ होंगे। ऎसे में कहा जा सकता है निस्संदेह गौरव मार्च 2011 के किसी खूबसूरत पल में एकोन्कागुआ पर तिरंगा लहराते हुए उस पल की खूबसूरती में और इजाफा कर रहे होंगे।

सात शिखर छूने का सपना ः

चूरू के बाशिंदे गौरव ने 20 मई 2009 को दुनिया की सबसे ऊंची पहाड़ी चोटी एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया था। इसके बाद उन्होंने विश्व के सातों महाद्वीपों के सर्वाधिक ऊंचाई वाले पर्वत शिखरों के आरोहण का संकल्प किया। इसी सपने को सच करने की दिशा में उन्होंने पिछले साल स्वाधीनता दिवस के मौके पर दक्षिणी अफ्रीका के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर माउंट किलीमिंजारो पर अपने कदम रखे। अपने इन अभियानों में गौरव को खासी शारीरिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पडा है लेकिन वे हार मानने वालों में से नहीं हैं। हर बार अपनी संघर्ष क्षमता के बूते इन्होंने सफलता का दामन थामा है।

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Monday, January 10, 2011

Thursday, September 9, 2010

चांद से फूल से या मेरी जुबां से सुनिए...

कुछ खास लोगों को यह तकलीफ हमेशा ही रही कि वे कलक्टर जैसे पद पर रहते हुए आम आदमी के करीब रहे। यह तकलीफ निस्संदेह एक बेहतर और सकारात्मक तस्वीर सामने लाती है। आम आदमी की दुश्वारियों और पीड़ाओं के लिए इनके भीतर का एक संवेदनशील मनुष्य हमेशा जागता रहा। ...और इसी जागते हुए आदमी ने इनके कलक्टर को वह सब करने में लगाए रखा, जिससे कहीं कहीं उस आम आदमी को राहत मिले। दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करते उस आम आदमी को उसके हक मिलें, यह सोच-यह विजन डॉ कृष्णाकांत पाठक के कामकाज में हमेशा नजर आता रहा।

महानरेगा जैसी महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी योजना में डॉ पाठक ने अपने नवाचारों के चलते चूरू को देशभर में अहम मुकाम दिलाया है। योजना जितनी बड़ी और अहम है, भ्रष्टाचार अनियमितताओं की गुंजाईशें भी उतनी ही अधिक हैं। जब तक ये गुंजाईशें खत्म नहीं होती, तब तक आम आदमी को इसका पूरा लाभ मिलना संभव ही नहीं। यही वजह थी कि योजना में गड़बड़ी के सारे सुराख बंद करने की ओर डॉ पाठक ने लगातार ध्यान बनाए रखा और इसी प्रगतिशील सोच का ही परिणाम था कि चूरू ई-मस्टररोल जारी करने वाला राजस्थान का प्रथम जिला बना। यह इस योजना में अनियमितताओं पर अंकुश की दिशा में एक बड़ी पहल थी, जिसमें निश्चित रूप से स्वयं डॉ पाठक ने व्यक्तिगत रूप से रूचि ली और यह एक कारगर कदम हुआ।

भुगतान में विलंब महानरेगा की एक बड़ी समस्या थी। महीनों तक मजदूरों को उनकी मजदूरी नहीं मिल रही थी। यह एक देशव्यापी समस्या थी। निम्न स्तर पर जीवन यापन करने वाले मजदूरों को अपनी मजदूरी के लिए महीनों इंतजार करना पड़े, यह डॉ पाठक को गवारा हुआ। नरेगा अधिनियम भी यही कहता है कि 15 दिनों में लोगों को उनकी मजदूरी मिले। ऎसे में डॉ पाठक ने एक नवीन कार्ययोजना बनाई, जिसमें पखवाड़ा समाप्त होने के बाद एक सप्ताह में सारी औपचारिकताएं, सारी प्रक्रियाएं पूरी हों और ज्यादा से ज्यादा 15 दिनों में मजदूरों को उनकी मजदूरी मिल जाए। यह तमाम कसरत काम आई और आज (कुछ अपवादों को छोड़कर) हम दावा कर सकते हैं कि चूरू 15 दिनों में महानरेगा श्रमिकों को उनकी मजदूरी का भुगतान कर रहा है। ऎसा करने वाले हम देश में प्रथम हैं।

महानरेगा चूंकि ग्राम पंचायत स्तर की योजना है और रोजगार देने में कहीं कहीं सरपंच, ग्रामसेवक और रोजगार सहायक की भूमिका रहती है। स्थानीय स्तर पर इनकी अपनी रूचियां भी योजना को प्रभावित करती ही हैं। इस तंत्र की नकारात्मक भूमिका के चलते कुछ लोग जरूरतमंद होने के बावजूद योजना से नहीं जुड़ पा रहे थे। डॉ पाठक ने इसे समझा और एक अभियान चलाकर प्रत्येक जॉब कार्ड धारी से नरेगा में रोजगार के लिए आवेदन भराने का काम कराया। आवेदन नंबर छह का एक नया फॉरमेट बना। वर्ष भर में किन पखवाड़ों में काम चाहिए, यह ग्रामीणों को नए प्रपत्र में अंकित करना था। अभियान के दौरान नए जॉब कार्ड भी बनाए गए और सत्यापन भी किया गया। नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में नए जॉब कार्ड बने और लोगों ने आवेदन भरे। अब उन्हीं आवेदनों के आधार पर मस्टररोल जारी किए जा रहे हैं।

15 अगस्त 2010 से चूरू में लागू किया गया ‘पब्लिक ग्रिवांस रिड्रेसल सिस्टम’ भी कहीं कहीं डॉ पाठक के भीतर की संवेदनशीलता की ही प्रतिक्रिया है। डॉ पाठक देखते हैं कि अनगिनत अनियमितताओं के बावजूद मुश्किल से तो कोई शिकायत करने की हिम्मत ( या हिमाकत ?) करता है और वही शिकायत जब फाइलों में दम तोड़ देती है तो शिकायत करने वाले के गाल पर यह दूसरा तमाचा होता है। किसी व्यक्ति की शिकायत पर क्या कार्यवाही हो रही है और वह किस स्तर पर चल रही है, देखने के लिए जिले में पब्लिक ग्रिवांस रिड्रेसल सिस्टम ‘लोकवाणी’ लागू करने की पहल की गई है। निसंदेह आने वाला समय ‘लोकवाणी’ के चमत्कार दिखाएगा। आज तमाम पदों पर कुंडली मारे बैठे लोग सूचनाओं को छिपाने के सारे षडयंत्र करने में जुटे हैं तो निश्चित रूप से ‘लोकवाणी’ कहीं कहीं पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता के लिहाज से मिसाल है।
लोगों को तकनीक से जोड़ने और उसका फायदा दिलाने में हमेशा पाठक साहब की रूचि रही। डॉ पाठक ने जब देखा कि सारे राज्य में एक साथ शुरू किए गए जिला कम्प्यूटर प्रशिक्षण केंद्र (डीसीटीसी) ‘सफेद हाथी’ बनते जा रहे हैं तो उन्होंने डीसीटीसी का स्वरूप बदलने के लिए कमर ही कस ली। डॉ पाठक की व्यक्तिगत रूचि का ही नतीजा है कि आज चूरू डीसीटीसी अपनी उपलब्धियों के लिए पूरे प्रदेश में मॉडल है और यहां दिए गए प्रशिक्षणों के बाद दूसरे जिलों में स्थित केंद्रों की दशा भी सुधरने चली है।

अकाल के साये में अक्सर रहने वाले चूरू में जब पिछले दिनों इंद्रदेव मेहरबान हुए और बाढ़ के चलते लोगों को मुश्किलें झेलनी पड़ीं, तब पाठक साहब की संवेदनशीलता देखते ही बनी। उनके द्वारा दी गई तात्कालिक आर्थिक मदद तो अपनी जगह है लेकिन उनका लगातार बाढ़ पीड़ितों के बीच मौजूद रहकर काम करना प्रभावित करने वाला था। उन्होंने एक स्वयंसेवक की तरह निरंतर काम करते हुए पाठक साहब ने लोगों को यह यकीन दिला दिया कि कोई है जो उनकी तकलीफों को बराबर शिद्दत से महसूस करता है और इन तकलीफों को कम करने के लिए बातों में नहीं, काम में यकीन रखता है। गुजरात में आपदा राहत के लिए कमिश्नर एसआर राव को याद किया जाता है। सूरत में 2006 की बाढ के बाद कुछ ही दिनों में उन्होंने इस त्रासदी के नामोनिशां तक मिटा दिए थे। बाढ के बीस दिन बाद ही सूरत की सड़कों पर घूमते हुए मेरे लिए यह कहना मुश्किल था कि यह शहर इतनी बड़ी विभीषिका को हाल ही में झेल चुका है। बाढ की स्थिति और संसाधनों में अंतर अलग मुद्दा है। संवेदनशीलता और सक्रियता के लिहाज से डॉ पाठक कहीं भी श्री एसआर राव से कम नहीं ठहरते।

ऎसी ही अनेक उपलब्धियों से डॉ कृष्णाकांत पाठक का दामन भरा पड़ा है लेकिन पाठक साहब की सर्वाधिक चर्चा और सराहना जिस बात के लिए होती है, वह है इनकी संवेदनशीलता, सरलता और सुमधुर व्यवहार। जो भी इनसे मिला, वो इन्ही का हो लिया। जीवन में और खासकर इतने महत्वपूर्ण पद पर तनाव के अनेक क्षण जाते हैं, हालात कई बार विपरीत हो जाते हैं लेकिन शायद ही किसी ने पाठक साहब को असहज देखा हो। मनुष्य के लिए एक दुर्लभ सी स्थितप्रज्ञता इनके भीतर देखने को मिली। पाठक साहब से मुलाकात से पहले मैं निजी रूप से एक व्यक्ति को इसके लिए याद करता था। दैनिक भास्कर सीकर में मेरे एक सीनियर थे श्री अनिल कर्मा। मैंने कभी उन्हें गुस्सा होते हुए नहीं देखा। कठोरतम बातें भी वे बड़ी सहजता से कहा करते थे और कम से कम मैं तो उनके मृदु व्यवहार से खासा प्रभावित था। ठीक वैसी ही सहजता पाठक साहब में मुझे देखने को मिली। कैसी भी परिस्थिति हो और सामने कोई भी व्यक्ति हो, डॉ पाठक के भीतर का ‘मनुष्य’ इनके ‘कलक्टर’ पर हमेशा भारी रहा।

डॉ पाठक को उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएं...

मानवता के लिए काम करने का उनका यह जज्बा बरकरार रहे, ईश्वर से यही प्रार्थनाएं...

Monday, August 30, 2010

दो दिन लगातार मिली ‘खुराक’

चूरू शहर के पिछले दो दिन बेहद साहित्यिक गुजरे। देशभर में अपनी अनूठी पहचान रखने वाले नगरश्री सभागार में शनिवार और रविवार दोनों ही शामें साहित्यिक रूचि रखने वाले लो के लिए खुराक लेकर आईं। साहित्य जगत की विभिन्न नामवर हस्तियां शहर से मुखातिब हुईं। सौभाग्य से मुझे दोनों कार्यक्रमों में शामिल होने का मौका मिला।

शनिवार को प्रयास संस्थान चूरू की ओर से दिया जाने वाला डॉ घासीराम वर्मा पुरस्कार जयपुर के प्रसिद्ध कवि हेमंत शेष को देश के शीर्ष कथाकारों में शुमार नासिरा शर्मा के हाथों मिला। वर्ष 2010 का यह पुरस्कार उन्हें उनकी कृति ‘जगह जैसी जगह ’ के लिए प्रदान किया गया।

सम्मानित कवि हेमंत शेष ने इस मौके पर कहा, ‘‘साहित्य और संस्कूति के क्षेत्र में जो कार्य हो रहा है, वह निश्चित रूप से किसी युद्ध, हिंसा, घृणा और राजनीति से महत्वपूर्ण कार्य है। शब्द समूचे संसार का आधार है और वह समाज को नई शक्ति देता है। साहित्य इसलिए निर्विकल्प है क्योंकि हमारे लिए भाषा का कोई विकल्प नही और हमारी जिज्ञासाओं, चिंताओं, आशाओं, आशंकाओं और संभावनाओं का भी कोई विकल्प नहीं हैं। ये तमाम चीजें हमारे मनुष्य होने के अहसास को और गहरा करती हैं। साहित्य की एक लंबी परंपरा मौजूद होने के कारण आधुनिक साहित्यकार होना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि जो लिखा गया है उससे अलग होना और एकदम नया कर पाना मुश्किल है। जब तक संसार में अच्छी चीजों की संभावनाएं हैं, तब तक साहित्य की प्रासंगिकता बनी रहेगी। ’’

समारोह के प्रधान वक्ता साहित्यकार गिरिराज किराड़ू इस मौके पर हेमंत शेष की पुरस्कृत पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए बोले, ‘‘ एक दुनिया है जो हमारे बीच से गायब हो रही है। हेमंत शेष की कविता ऎसी चीजों की लंबी सूची बनाती है जो हमारे बीच से गायब होकर था, थे, थी बनती जा रही हैं। हेमंत की कविता इस दुष्प्रचार का खंडन करती है कि आधुनिक कविता संवेदना और जीवन से कहीं दूर भटक रही है। ’’

विशिष्ट अतिथि प्रसिद्ध आलोचक डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा, ‘‘आयोजन की सफलता इस चिंता का खंडन करती है कि साहित्य की प्रासंगिकता खत्म हो गई है। आजादी के बाद एक बड़ी दुर्घटना हमारे साथ यह घटी कि हम प्रत्येक कार्य के लिए सरकार के मुखापेक्षी हो गए हैं लेकिन डॉ घासीराम वर्मा जैसे लोग इस बात को झुठलाते हैं। ’’

बीकानेर के साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी ने हेमंत शेष की कविता की असली ताकत उनकी भाषा को बताया। वे बोले, ‘‘हेमंत विषयों, प्रतीति और अनुभूति के हिसाब से वे उच्च स्तर के कवि हैं। ’’ उन्होंने अज्ञेय केा उद्धृत करते हुए कहा, ‘‘किसी भी अच्छी रचना को पढने के बाद आप वही नहीं रह जाते जो आप उस रचना को पढने से पहले थे। ’’

करोड़पति फकीर की संज्ञा से विभूषित प्रसिद्ध शिक्षाविद डॉ घासीराम वर्मा ने साहित्य और पुस्तकों को समाज की महत्ती जरूरत बताया। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे विद्यालयो के पुस्तकालयों में बंद किताबें विद्यार्थियों तक पहुंचे, ऎसे प्रयास शिक्षकों को करने चाहिए।’’

समारोह में भंवर सिंह सामौर, सुरेंद्र पारीक रोहित, दुलाराम सहारण, रामनाथ कस्वां, उम्मेद गोठवाल, हरिसिंह सिरसला, हनुमान कोठारी, सोहनसिंह दुलार, शेरिंसह बीदावत, बाल भवन जयपुर की निदेशक श्रीमती चरणजीत ढिल्लो, नगरश्री के श्याम सुंदर शर्मा, रामगोपाल बहड़, पूर्व विधायक रावतराम आर्य, पत्रकार माधव शर्मा, मदन लाल सिंगोदिया, शोभाराम बणीरोत, कमल शर्मा प्रदीप शर्मा, शिव कुमार शर्मा, संतोष कुमार पंछी सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी श्रोता उपस्थित थे।


डॉ घोटड़ की पुस्तक का विमोचन


समारोह के दौरान साहित्यकार डॉ रामकुमार घोटड़ की पुस्तक मेरी श्रेष्ठ लघुकथाएं का विमोचन मुख्य अतिथि नासिरा शर्मा ने किया। इस पुस्तक में डॉ घोटड़ के 25 वर्ष के साहित्यिक जीवन के दौरान लिखी गई लघुकथाओं में से स्वयं उनके नजरिए से बेहतरीन 58 लघुकथाएं संकलित की गई हैं। पुस्तक के प्रथम खंड में विभिन्न संग्रहों व पत्रिकाओं में प्रकाशित 25 तथा दूसरे खंड में 33 नवीन लघुकथाएं शामिल की गई हैं। समारोह में प्रयास संस्थान की समारोह केंद्रित स्मारिका का विमोचन अतिथियों ने किया।


बोधि पुस्तक पर्व एवं मायामृग

समारोह में बोधि पुस्तक पर्व प्रकाशन के लिए बोधि प्रकाशन जयपुर के मायामृग को सम्मानित किया गया। वक्ताओं ने उनकी इस पहल को पुस्तक जगत की नैनो क्रांति की संज्ञा देते हुए उनकी खुले दिल से सराहना की। सम्मानित प्रकाशक मायामृग ने कहा, ‘‘साहित्य प्रकाशन के क्षेत्र में जिस तरह विसंगतियां और विद्रूपताएं पैदा हो गई है, वैसे में थोड़ी जोर से आवाज जरूरी थी। पाठकों को वाजिब मूल्य पर किताब मिलनी ही चाहिए। हिंदी में असंख्य पाठक मौजूद है। कहीं न कहीं कमी हमारी है कि हम उन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।


प्रयास की ओर से पुस्तकें भेंट -

सम्मानित कवि हेमंत शेष ने पुरस्कार राशि पांच हजार एक सौ रुपए की राशि प्रयास संस्थान को साहित्यिक कार्य के लिए प्रदान की। प्रयास संस्थान की ओर से इतनी ही राशि और मिलाकर जिले के 51 पुस्तकालयों को पुस्तकों के सैट भेंट करने का निर्णय लिया गया। समारोह के दौरान प्रतीक स्वरूप विभिन्न पुस्तकालयों व विद्यालयों के प्रतिनिधियों को पुस्तकें भेंट की गईं।



रूबरू हुए बीकानेर के साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी


रविवार को पंडित कुंज बिहारी शर्मा स्मृति गोष्ठीमाला की 40 वीं कड़ी में बीकानेर के श्री मालचंद तिवाड़ी शहर के साहित्यप्रेमियों से रूबरू हुए।

राजस्थानी व हिंदी के वरिष्ठ कवि और कथाकार मालचंद तिवाड़ी ने अपनी रचनाओं से सुधी साहित्यप्रेमियों व श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।

वरिष्ठ कवि श्री प्रदीप शर्मा की गोष्ठी की शुरुआत में श्री मालचंद तिवाड़ी ने अपने साहित्यिक जीवन और दृष्टिकोण को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले शरतचंद्र के उपन्यास चरित्रहीन और उसकी मुख्य पात्र किरणमयी पर केंद्रित अपने चिंतनपरक आलेख से की। मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक विद्रूपताओं का चित्रण करती लघुकथाएं खबर और रूमाल साहित्यप्रेमियों ने खासी पसंद की। काव्यपाठ की शुरुआत तिवाड़ी ने अपनी राजस्थानी कविता सवार से की तो उनके अनुभूति और अभिव्यक्ति के स्तर को देखकर साहित्यप्रेमी चकित रह गए। मां की ममता और स्नेहिल स्पर्श की खुशबू से लबरेज मां रै सिराणै शृंखला की पांच कविताओं को सुनकर श्रोताओं की आंखें नम हुए बिना नहीं रह सकीं। कूं-कूं रा छांटा और अणसुणी बाळसाद जैसी कविताओं ने भी भाव-विभोर कर दिया। विश्वविख्यात पंजाबी कवि सुरजीत पातर की मालचंद तिवाड़ी द्वारा अनुदित कविताओं साज कैवे तलवार नैं और इतिहास ने सुधी श्रोताओं के हृदय को भीतर तक झकझोर दिया।


इस मौके पर अपने आत्मकथ्य में साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी ने कहा, ‘‘ अभ्यास और साहित्यिक सत्संग से लेखन में निखार अवश्य आता है लेकिन वे प्रतिभा के स्थानापन्न नहीं हो सकते। लेखक होना एक तरह की आत्मविष्कृति है और मनुष्य की एक निर्विकल्प परिस्थिति है। स्थिति कुछ-कुछ ऎसी है कि मैं तो कंबल को छोड़ दूं पर यह कंबल मुझे नहीं छोड़ता। साहित्य क्षेत्र की उठापटक और राजनीति से कई बार वितृष्णा होती है लेकिन विवशता यह है कि मैं इसे छोड़ नहीं पाता। ’’

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि प्रदीप शर्मा ने कहा, ‘‘ जब हृद्य भरा होता है तो शब्द कम होते हैं और तिवाड़ी की रचनाएं हृद्य को छूने वाली हैं। विभिन्न घटनाओं, संबंधों और चीजों के प्रति उनकी अंतर्दृष्टि और सूक्ष्म विवेचन क्षमता प्रभावित करती है।’’

साहित्यकार दुलाराम सहारण ने कहा कि तिवाड़ी की कहानियां और कविताएं प्रत्येक आम और खास के भीतर तक पहुंचते हुए अपना असर छोड़ती हैं।

मोहन सिंह मानव, सुरेंद्र पारीक रोहित, कमल शर्मा, रामसिंह बीका ने भी तिवाड़ी की कविताओं पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि वे मानवीय संवेदना के कवि हैं।

इस मौके पर शॉल ओढाकर मालचंद तिवाड़ी का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में रामसिंह बीका, देवकिशन सैनी, रामनिवास सर्राफ, डॉ शेरसिंह बीदावत, रामनाथ कस्वां, रामावतार साथी, दुलाराम सहारण, कमल शर्मा सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी मौजूद थे।


संबंधों की ऊष्मा के चितेरे श्री मालचंद जी तिवाड़ी-

मानवीय संवेदनाओं और संबंधों की ऊष्मा का अपनी रचनाओं में प्रभावी चित्रण करने वाले मालचंद तिवाड़ी का जन्म 19 मार्च 1958 को बीकानेर में हुआ। इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें हिंदी कहानी संग्रह पानीदार तथा अन्य कहानियां, ‘सुकांत के सपनों में, ‘जालिया और झरोखे, ‘त्राण तथा अन्य कहानियां, उपन्यास पर्यायवाची, एच जी वेल्स की महान विज्ञान कथा टाइम मशीन हिंदी अनुवाद, राजस्थानी में उपन्यास भोळावण, कविता संग्रह उर्तयो है आभो, कहानी संग्रह सेलिब्रेशन मुख्य हैं। इन्हें राष्ट्रीय स्तर का साहित्य अकादेमी पुरस्कार, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी का सर्वोच्च सूर्यमल्ल मिश्रण पुरस्कार, लखोटिया पुरस्कार, गणेशीलाल व्यास पुरस्कार सहित विभिन्न पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। पांच साल तक केंद्रीय अकादेमी की राजस्थानी परामर्श समिति में संयोजक रह चुके तिवाड़ी वर्तमान में अकादेमी की राइटर एट रेजीडेंस योजना के अंतर्गत लेखन कार्य कर रहे हैं।

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