Monday, August 30, 2010

दो दिन लगातार मिली ‘खुराक’

चूरू शहर के पिछले दो दिन बेहद साहित्यिक गुजरे। देशभर में अपनी अनूठी पहचान रखने वाले नगरश्री सभागार में शनिवार और रविवार दोनों ही शामें साहित्यिक रूचि रखने वाले लो के लिए खुराक लेकर आईं। साहित्य जगत की विभिन्न नामवर हस्तियां शहर से मुखातिब हुईं। सौभाग्य से मुझे दोनों कार्यक्रमों में शामिल होने का मौका मिला।

शनिवार को प्रयास संस्थान चूरू की ओर से दिया जाने वाला डॉ घासीराम वर्मा पुरस्कार जयपुर के प्रसिद्ध कवि हेमंत शेष को देश के शीर्ष कथाकारों में शुमार नासिरा शर्मा के हाथों मिला। वर्ष 2010 का यह पुरस्कार उन्हें उनकी कृति ‘जगह जैसी जगह ’ के लिए प्रदान किया गया।

सम्मानित कवि हेमंत शेष ने इस मौके पर कहा, ‘‘साहित्य और संस्कूति के क्षेत्र में जो कार्य हो रहा है, वह निश्चित रूप से किसी युद्ध, हिंसा, घृणा और राजनीति से महत्वपूर्ण कार्य है। शब्द समूचे संसार का आधार है और वह समाज को नई शक्ति देता है। साहित्य इसलिए निर्विकल्प है क्योंकि हमारे लिए भाषा का कोई विकल्प नही और हमारी जिज्ञासाओं, चिंताओं, आशाओं, आशंकाओं और संभावनाओं का भी कोई विकल्प नहीं हैं। ये तमाम चीजें हमारे मनुष्य होने के अहसास को और गहरा करती हैं। साहित्य की एक लंबी परंपरा मौजूद होने के कारण आधुनिक साहित्यकार होना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि जो लिखा गया है उससे अलग होना और एकदम नया कर पाना मुश्किल है। जब तक संसार में अच्छी चीजों की संभावनाएं हैं, तब तक साहित्य की प्रासंगिकता बनी रहेगी। ’’

समारोह के प्रधान वक्ता साहित्यकार गिरिराज किराड़ू इस मौके पर हेमंत शेष की पुरस्कृत पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए बोले, ‘‘ एक दुनिया है जो हमारे बीच से गायब हो रही है। हेमंत शेष की कविता ऎसी चीजों की लंबी सूची बनाती है जो हमारे बीच से गायब होकर था, थे, थी बनती जा रही हैं। हेमंत की कविता इस दुष्प्रचार का खंडन करती है कि आधुनिक कविता संवेदना और जीवन से कहीं दूर भटक रही है। ’’

विशिष्ट अतिथि प्रसिद्ध आलोचक डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा, ‘‘आयोजन की सफलता इस चिंता का खंडन करती है कि साहित्य की प्रासंगिकता खत्म हो गई है। आजादी के बाद एक बड़ी दुर्घटना हमारे साथ यह घटी कि हम प्रत्येक कार्य के लिए सरकार के मुखापेक्षी हो गए हैं लेकिन डॉ घासीराम वर्मा जैसे लोग इस बात को झुठलाते हैं। ’’

बीकानेर के साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी ने हेमंत शेष की कविता की असली ताकत उनकी भाषा को बताया। वे बोले, ‘‘हेमंत विषयों, प्रतीति और अनुभूति के हिसाब से वे उच्च स्तर के कवि हैं। ’’ उन्होंने अज्ञेय केा उद्धृत करते हुए कहा, ‘‘किसी भी अच्छी रचना को पढने के बाद आप वही नहीं रह जाते जो आप उस रचना को पढने से पहले थे। ’’

करोड़पति फकीर की संज्ञा से विभूषित प्रसिद्ध शिक्षाविद डॉ घासीराम वर्मा ने साहित्य और पुस्तकों को समाज की महत्ती जरूरत बताया। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे विद्यालयो के पुस्तकालयों में बंद किताबें विद्यार्थियों तक पहुंचे, ऎसे प्रयास शिक्षकों को करने चाहिए।’’

समारोह में भंवर सिंह सामौर, सुरेंद्र पारीक रोहित, दुलाराम सहारण, रामनाथ कस्वां, उम्मेद गोठवाल, हरिसिंह सिरसला, हनुमान कोठारी, सोहनसिंह दुलार, शेरिंसह बीदावत, बाल भवन जयपुर की निदेशक श्रीमती चरणजीत ढिल्लो, नगरश्री के श्याम सुंदर शर्मा, रामगोपाल बहड़, पूर्व विधायक रावतराम आर्य, पत्रकार माधव शर्मा, मदन लाल सिंगोदिया, शोभाराम बणीरोत, कमल शर्मा प्रदीप शर्मा, शिव कुमार शर्मा, संतोष कुमार पंछी सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी श्रोता उपस्थित थे।


डॉ घोटड़ की पुस्तक का विमोचन


समारोह के दौरान साहित्यकार डॉ रामकुमार घोटड़ की पुस्तक मेरी श्रेष्ठ लघुकथाएं का विमोचन मुख्य अतिथि नासिरा शर्मा ने किया। इस पुस्तक में डॉ घोटड़ के 25 वर्ष के साहित्यिक जीवन के दौरान लिखी गई लघुकथाओं में से स्वयं उनके नजरिए से बेहतरीन 58 लघुकथाएं संकलित की गई हैं। पुस्तक के प्रथम खंड में विभिन्न संग्रहों व पत्रिकाओं में प्रकाशित 25 तथा दूसरे खंड में 33 नवीन लघुकथाएं शामिल की गई हैं। समारोह में प्रयास संस्थान की समारोह केंद्रित स्मारिका का विमोचन अतिथियों ने किया।


बोधि पुस्तक पर्व एवं मायामृग

समारोह में बोधि पुस्तक पर्व प्रकाशन के लिए बोधि प्रकाशन जयपुर के मायामृग को सम्मानित किया गया। वक्ताओं ने उनकी इस पहल को पुस्तक जगत की नैनो क्रांति की संज्ञा देते हुए उनकी खुले दिल से सराहना की। सम्मानित प्रकाशक मायामृग ने कहा, ‘‘साहित्य प्रकाशन के क्षेत्र में जिस तरह विसंगतियां और विद्रूपताएं पैदा हो गई है, वैसे में थोड़ी जोर से आवाज जरूरी थी। पाठकों को वाजिब मूल्य पर किताब मिलनी ही चाहिए। हिंदी में असंख्य पाठक मौजूद है। कहीं न कहीं कमी हमारी है कि हम उन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।


प्रयास की ओर से पुस्तकें भेंट -

सम्मानित कवि हेमंत शेष ने पुरस्कार राशि पांच हजार एक सौ रुपए की राशि प्रयास संस्थान को साहित्यिक कार्य के लिए प्रदान की। प्रयास संस्थान की ओर से इतनी ही राशि और मिलाकर जिले के 51 पुस्तकालयों को पुस्तकों के सैट भेंट करने का निर्णय लिया गया। समारोह के दौरान प्रतीक स्वरूप विभिन्न पुस्तकालयों व विद्यालयों के प्रतिनिधियों को पुस्तकें भेंट की गईं।



रूबरू हुए बीकानेर के साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी


रविवार को पंडित कुंज बिहारी शर्मा स्मृति गोष्ठीमाला की 40 वीं कड़ी में बीकानेर के श्री मालचंद तिवाड़ी शहर के साहित्यप्रेमियों से रूबरू हुए।

राजस्थानी व हिंदी के वरिष्ठ कवि और कथाकार मालचंद तिवाड़ी ने अपनी रचनाओं से सुधी साहित्यप्रेमियों व श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।

वरिष्ठ कवि श्री प्रदीप शर्मा की गोष्ठी की शुरुआत में श्री मालचंद तिवाड़ी ने अपने साहित्यिक जीवन और दृष्टिकोण को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले शरतचंद्र के उपन्यास चरित्रहीन और उसकी मुख्य पात्र किरणमयी पर केंद्रित अपने चिंतनपरक आलेख से की। मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक विद्रूपताओं का चित्रण करती लघुकथाएं खबर और रूमाल साहित्यप्रेमियों ने खासी पसंद की। काव्यपाठ की शुरुआत तिवाड़ी ने अपनी राजस्थानी कविता सवार से की तो उनके अनुभूति और अभिव्यक्ति के स्तर को देखकर साहित्यप्रेमी चकित रह गए। मां की ममता और स्नेहिल स्पर्श की खुशबू से लबरेज मां रै सिराणै शृंखला की पांच कविताओं को सुनकर श्रोताओं की आंखें नम हुए बिना नहीं रह सकीं। कूं-कूं रा छांटा और अणसुणी बाळसाद जैसी कविताओं ने भी भाव-विभोर कर दिया। विश्वविख्यात पंजाबी कवि सुरजीत पातर की मालचंद तिवाड़ी द्वारा अनुदित कविताओं साज कैवे तलवार नैं और इतिहास ने सुधी श्रोताओं के हृदय को भीतर तक झकझोर दिया।


इस मौके पर अपने आत्मकथ्य में साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी ने कहा, ‘‘ अभ्यास और साहित्यिक सत्संग से लेखन में निखार अवश्य आता है लेकिन वे प्रतिभा के स्थानापन्न नहीं हो सकते। लेखक होना एक तरह की आत्मविष्कृति है और मनुष्य की एक निर्विकल्प परिस्थिति है। स्थिति कुछ-कुछ ऎसी है कि मैं तो कंबल को छोड़ दूं पर यह कंबल मुझे नहीं छोड़ता। साहित्य क्षेत्र की उठापटक और राजनीति से कई बार वितृष्णा होती है लेकिन विवशता यह है कि मैं इसे छोड़ नहीं पाता। ’’

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि प्रदीप शर्मा ने कहा, ‘‘ जब हृद्य भरा होता है तो शब्द कम होते हैं और तिवाड़ी की रचनाएं हृद्य को छूने वाली हैं। विभिन्न घटनाओं, संबंधों और चीजों के प्रति उनकी अंतर्दृष्टि और सूक्ष्म विवेचन क्षमता प्रभावित करती है।’’

साहित्यकार दुलाराम सहारण ने कहा कि तिवाड़ी की कहानियां और कविताएं प्रत्येक आम और खास के भीतर तक पहुंचते हुए अपना असर छोड़ती हैं।

मोहन सिंह मानव, सुरेंद्र पारीक रोहित, कमल शर्मा, रामसिंह बीका ने भी तिवाड़ी की कविताओं पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि वे मानवीय संवेदना के कवि हैं।

इस मौके पर शॉल ओढाकर मालचंद तिवाड़ी का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में रामसिंह बीका, देवकिशन सैनी, रामनिवास सर्राफ, डॉ शेरसिंह बीदावत, रामनाथ कस्वां, रामावतार साथी, दुलाराम सहारण, कमल शर्मा सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी मौजूद थे।


संबंधों की ऊष्मा के चितेरे श्री मालचंद जी तिवाड़ी-

मानवीय संवेदनाओं और संबंधों की ऊष्मा का अपनी रचनाओं में प्रभावी चित्रण करने वाले मालचंद तिवाड़ी का जन्म 19 मार्च 1958 को बीकानेर में हुआ। इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें हिंदी कहानी संग्रह पानीदार तथा अन्य कहानियां, ‘सुकांत के सपनों में, ‘जालिया और झरोखे, ‘त्राण तथा अन्य कहानियां, उपन्यास पर्यायवाची, एच जी वेल्स की महान विज्ञान कथा टाइम मशीन हिंदी अनुवाद, राजस्थानी में उपन्यास भोळावण, कविता संग्रह उर्तयो है आभो, कहानी संग्रह सेलिब्रेशन मुख्य हैं। इन्हें राष्ट्रीय स्तर का साहित्य अकादेमी पुरस्कार, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी का सर्वोच्च सूर्यमल्ल मिश्रण पुरस्कार, लखोटिया पुरस्कार, गणेशीलाल व्यास पुरस्कार सहित विभिन्न पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। पांच साल तक केंद्रीय अकादेमी की राजस्थानी परामर्श समिति में संयोजक रह चुके तिवाड़ी वर्तमान में अकादेमी की राइटर एट रेजीडेंस योजना के अंतर्गत लेखन कार्य कर रहे हैं।

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Tuesday, August 3, 2010

कामयाबी का लम्हा


परसों सवेरे सवेरे पांच बजे उठते ही दैनिक भास्कर देख रहा था। अचानक रिजल्ट जैसी कोई चीज दिखी। देखा तो राजस्थानी एम.ए. फाइनल का रिजल्ट छपा था। मुझे अपने रोल नंबर याद न थे। मैंने देखा, प्रथम श्रेणी में र्सिफ चार लोगों के रोल नंबर छपे थे। मैंने रोल नंबर याद करने के लिए स्मृति पर जोर दिया तो लगा कि उनमें से एक रोल नंबर मेरा था। खुशी हुई ये सोचकर। घर में किताबों-कागजों में परीक्षा एडमिशन र्काड ढूंढकर कन्र्फम किया। फिर दुलाराम जी को फोन किया इंटरनेट पर रिजल्ट देखने के लिए। उन्होंने बताया कि नेट पर रिजल्ट नहीं था। फिर बैटरी रिर्चाज नहीं होने के कारण मोबाइल काम नहीं कर रहा था तथा दूरसंचार विभाग की मेहरबानी के चलते बेसिक फोन खराब था। फिर महावीर जी नेहरा आ घर आ गए। उनसे बातचीत के दौरान कोई नंबर देखने के लिए मोबाइल ऑन करने की कोशिश की तो कादंबिनी क्लब के राजेंद्र र्शमा जी का फोन आ गया। उन्होंने मेरे यूनिर्वसिटी टॉपर होने की सूचना दी। मेरी खुशी का ठिकाना न था। तभी मोबाइल पर दुलाराम जी के लगातार मैसेज आने शुरू हो गए, गोल्ड मेडल की सूचना और बधाई के। दुलाराम जी ने सब परिचितों को एसएमएस कर दिए थे। सो सबके मैसेज व फोन आने शुरू हो गए। बैटरी नहीं होने के कारण मोबाइल बंद हो रहा था। वापस ऑन करने पर एक दो मैसेज मिलते और मोबाइल फिर बंद हो जाता। नगर श्री चूरू के श्री श्याम सुंदर र्शमा, श्री रामगोपाल जी बहड़, श्री बाबू लाल जी र्शमा, श्री बैजनाथ जी पंवार, श्री मानसिंह जी सामौर, श्री माधव शर्मा, श्री नरेंद्र शर्मा, श्री विश्वनाथ भाटी तारानगर, श्री कुंज बिहारी जी पत्रकार, श्री भरत जी ओला, श्री किशन जी उपाध्याय, श्री विश्वनाथ जी सैनी पत्रकार, श्री किशोर र्निवाण, श्री संतोष गुप्ता जी पत्रकार, श्री आशीष गौतम पत्रकार, श्री गौरव र्शमा र्पवतारोही, नारायण जी मेघवाल, श्री रवि पुरोहित, श्री राधाकिशन सोनी डूंगरगढ, श्री हिमांशु दाधीच बीकानेर, श्री हिमांशु र्वमा जयपुर, श्री राकेश टेलर जयपुर, श्री मोहनलाल र्शमा पत्रकार बीकानेर, श्री अरविंद चोटिया जोधपुर, र्धमपाल र्शमा, अखिलेश, राजकुमार चोटिया सुजानगढ, अमित प्रजापत सुजानगढ, नरेंद्र सिंह ईटीवी, अमित तिवारी चूरू, नवीन उपाध्याय, सुरेंद्र सैनी प्रेस फोटोग्राफर सीकर, र्सवेश र्शमा सीकर, सुरेंद्र चौधरी सीकर, सारिका, अजीत राठौड़ जयपुर, डॉ कादिर हुसैन, डॉ जगदीश सिंह भाटी, श्री प्रदीप पूनिया, श्री भंवर लाल रूइल, श्री सुगन सिंह राठौड़, श्री महबूब सीधर, श्री संदीप जोशी, शैलेंद्र सोनी प्रेस फोटोग्राफर सहित बड़ी संख्या में शुभचिंतकों, दोस्तों और संंबंधियों ने फोन व मैसेज कर तथा मिलकर बधाई व शुभकामनाएं दीं। सभी शुभचिंतकों को इस दुलार व स्नेह के लिए धन्यवाद।

कामयाबी का यह लम्हा पूरी तरह माता-पिता और अग्रज समान श्री दुलाराम सहारण को सर्मपित करते हुए मुझे उन पर र्गव है। श्री दुलाराम जी ने ही राजस्थानी में एम.ए. के लिए प्रोत्साहित किया। राजस्थानी में पाठ्य सामग्री भी मुश्किल से मिल पाती है लेकिन उनके होते मुझे ऎसी कोई समस्या नहीं रही। वे समय-समय पर मुझे लगातार प्रेरित करते रहे। इसके बावजूद मुझे इस सफलता की इतनी उम्मीद न थी, पर वे लगातार विश्वास जताते थे कि स्र्वण पदक कुमार अजय, राजेंद्र र्शमा या रवि पुरोहित में से किसी एक को ही मिलेगा। उनकी इस पे्ररणा, स्नेह, आर्शीवाद, सहयोग और विश्वास को प्रणाम...।

आज लगभग सभी अखबारों में यह खबर लगी है। सभी सम्मानित पत्रकारों और संपादकों को इस स्नेह के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।







Tuesday, July 27, 2010

स्मृति अर सपनै री कविता

आप रै आखती-पाखती री घटनावां-चीजां अर आप री निजू अबखायां सूं कविता रो सामान कबाड़ण रै जतन में जुट्या जोध-जुवान उठतोड़ा कवि मदन गोपाल लढा रो पैलो कविता संग्रै म्हारै पांती री चिंतावाकवि मन रै ओळे-दोळे समूळी पीढी री िंचंतावां नै व्यक्त करै। नुंवै दौर रै बदळावां अर आप री मजर्बूयां रै बीचाळै खुद नैं असहज अर अर कदे-कदे असहाय मैसूस करतो कवि बड़ी ही सहजता रै साथै आप रै मन री बात कैंवतो लखावै। जुगु बदळावां नै लेयर कवि रै मांय वेदना रो जको गुब्बार है, अंतर्मन में जकी तकलीफ, लाचारी अर तड़प है, बीं सूं आपां सगळा ई कद किनारो नीं कर सकां हां। संग्रै री तमाम कवितावां में कठे ई कोई सबदजाळ नहीं, कठे ई कोई आडंबर-दिखावो नीं, अर न ई अपणै आप नै साबित करणै रो कोई जतन। बिलकुल साधारण सी दिखण आळी घटवानां अर सबदां नैं आप रै नजरियै सूं कवि इयां आपां रै सामीं राखै कै आपां भी वां सूं सहमत हुयां बिना नीं रैय सकां। कारण कै, वां अबखायां सूं आपां भी दिन-रात दो दो हाथ करां ई हां। अतीत रै झरोखै सूं झांकतो कवि वीं नै आहत करतै वर्तमान सूं जूझतो लखावै। बदळाव री लाय में दाझ्योड़ो कवि ईं जुग में अपणै आप नै अेकलो सो मैसूस करतो आप री यादां री पोटळी आपणै सामीं राखै। कवि री स्मृतियां रा अै बिंब जद आपणै सामीं खड्या हुवै तो मैसूस हुवै कै स्मृति री वै की वै समानांतर ईमारतां आपां रै मन रै किणी कूणै में ई मौजूद है।

हेत मदन री कविता रो मूल स्वर है। किणी कविता में सायास तो किणी में अनायास ई ओ हेत आप री मौजूदगी दर्ज करा जावै। मन री पाटी माथै मंड्योड़ा हेत रा हरफां नैं डोवणै में असमर्थ होयर आखर री आरसी में हेताळू रो उणियारो ओळखतै कवि नै हेत रै ओळावै सूं सगळी दुनियां ई चोखी लागै। जूण जातरा में प्रेम री ईं सूं बेसी कुणसी भूमिका होय सकै है। प्रेम रै ई आदर्श स्वरूप रै कारण ई कवि आ कैवै- कोनी घणो आंतरो/ थारै हुवणै/ अर नीं हुवणै बीचाळै। कवि रो निजूं प्रेम ईं ऊंचाई तांई पूगणै सूं ई आखै मानखै सूं प्रेम में बदळग्यो है।

बाजार री ताकत आज सै सूं प्रभावी है, संवेदनशील कवि मन में ई री टीस हुवणी सुभाविक है। मदन री कविता में ई आस टीस साफ व्यक्त हुवै- भाड़ै मिल जावै/ कूख तकात (कोनी चालै जोर) पण साथै ई बाजार री जद बतांवता थकां इणीज कविता में वै अेक भरोसो सो ई दिरावै। वै कैवे- पण मेह, मौत अर सपना ई/अलघा है/ बाजार री जद सूं।

कवि चाये कोई भी हुवै, बीं ने अतीत सूं खास लगाव रैवे। बदळाव री आंधी में संस्कारां री लुकमींचणी वीं रै बर्दाश्त री सींव सूं बारै हुवै। मदन री कविता में ई आ खासियत है कै वां नै आप रै अतीत सूं गैरो मोह है। आ मोहग्रस्तता कवि रै संवेदना पक्ष री ताकत तो है पण जद कवि आखरी कविता तांई इण मोह सूं बारै नीं निकळै जद अेक चिंता सी ई हुवै। अठै कवि री आ खासियत भरोसो दिरावै कै कवि आप री विगत सूं मोहग्रस्त तो है, पण शोकग्रस्त नीं है। आपबीती नैं याद करर कवि फगत पीड़ा में आणंद री अनुभूति ई करतो लखावै। आत्मुग्धता कविमन रो सुभाविक गुण है, जको केई कवितावां में झलकै पण साथै ई साथै कवि बीजै लोगां री अबखाया, पीड़ावां अर चिंतावां री ई बात करै। आं कवितावां मांय दिसावरी करणियां रै मन री पीड़ है तो माटी रै सबदां नै पगां सूं खूंध, बीं री गांठां तोड़ अर पसीनो रळा-र मटकी बणावंतै कुंभार रै औळावै सूं मिणत-मजूरी करणियै लोगां रो समर्पण ई है। बगत रै सागै होड़ मांय खुद री जिंदगी नै घूम-चक्करी बणनै सूं बचावण में जुट्यो कवि मानखै री पीड़ आप रै सबदां में ढाळणै री खिमता ई चावै। नीम री छिंया में दादोसा रो उणियारो जोंवतो कवि टाबर रै सपनांर बिरछ री डाळ्यां रै ओळावै सूं आप री पर्यावरणीय संवेदना नै ई सबद देवै।

राजस्थानी नै मानता री कवि री चाह व्यक्त हुयां बिन नीं रैय सकै जद वो कैवे- जिंयां गाय बिना खूंटो/ टीकै बिना लिलाड़/ अर मूरत बिना हुवै मिंदर/ठीक बिंया ई/ भासा बिना हुवै मिनख (म्हानै म्हारी भासा चाइजै)

कुल मिलार कैयो जा सकै कै ऊपर सूं सांत पण मांय सूं उद्वेलित अै कवितावां कवि री स्मृति अर सपनै री कवितावां है, जिण मांय पाठक नै आप री स्मृति अर सपनां अेकमेक हुंवता लखावै। कवि री संभावना अर खिमता रा दरसण करावंतै संग्रै सूं आस करी जा सकै है कै वो राजस्थानी रै हेताळुवां रै हिड़दे तांई पूगसी।


Tuesday, June 29, 2010

धन्यवाद नगरश्री परिवार

ऎतिहासिक महत्व रखने वाला चूरू का नगरश्री संस्थान अपने ढंग का अनूठा केंद्र है। लगातार यहां होने वाली साहित्यिक गतिविधियां जिले के साहित्यप्रेमियों के आकर्षण का केंद्र रहती है। पिछले काफी समय में प्रत्येक माह के अंतिम रविवार को पं. कुंजबिहारी शर्मा की स्मृति में ‘सृजन से साक्षात्कार’ गोष्ठी का आयोजन किया जाता है। गोष्ठी में किसी एक साहित्यकार को सम्मानित किया जाता है तथा सम्मानित साहित्यकार के सृजन का प्रतिनिधित्व करने वाली रचनाएं पेश की जाती हैं।
पिछले रविवार (27 जून) शाम को नगरश्री में सम्मान और अपनी रचनाओं के प्रस्तुतिकरण का यह गौरव मुझे मिला। मैंने अपनी गजलें, राजस्थानी व हिंदी कविताएं पेश कीं। वरिष्ठ साहित्यकार श्री बैजनाथ जी पंवार के सानिध्य और प्रोफेसर श्री भंवरसिंह जी सामौर की अध्यक्षता में आयोजित इस समारोह में शहर के बुद्धिजीवियों का खूब आशीर्वाद मिला।
मेरे प्रस्तुतिकरण के बाद श्री मोहनसिंह मानव, सेवानिवृत्त वरिष्ठ अध्यापक बाबूलाल शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार प्रदीप शर्मा मधुप, आयोजनधर्मी साहित्यकार श्री दुलाराम सहारण, डीसीटीसी प्रभारी श्री ओम फगेड़िया आदि ने मेरे प्रस्तुतिकरण पर समीक्षात्मक टिप्पणी दी।
श्री दुलाराम सहारण ने मुझे उलाहना भी दिया कि पुस्तकों के अध्ययन में लेकर मैं कुछ लापरवाह हूं। निश्चित रूप से मैं मानता हूं कि उनकी शिकायत सही है। मुझमें कहीं न कहीं इस संकल्प का अभाव ही है कि मैं अध्ययन के लिए समय अक्सर नहीं निकाल पाता हूं।










Friday, May 28, 2010

अमिताभ, जया और अमर सिंह...

अमिताभ बच्चन ने अक्सर पर अपने सुलझे हुए इंसान होने का सबूत दिया है। विवादों से घिरते-घिरते कैसे वे एकदम से अपने आपको बचा ले जाते हैं, यह कई बार देखने को मिला है। सोनिया-राहुल और जया-अभिषेक के बीच हुए वाकयुद्ध के समय ‘वे राजा हैं और हम रंक है’ जैसी गंभीर, संजीदा और भावपूर्ण प्रतिक्रिया देकर उन्होंने खासा प्रभावित किया था।
अपने पिता के समय से ही उनके रिश्ते नेहरू परिवार से काफी नजदीकी रहे हैं। बीच में जब राजीव गांधी नहीं रहे और सोनिया गांधी राजनीति में सक्रिय नहीं हुई थीं, उन दिनों अमिताभ भी अपने जीवन बुरे दौर से गुजर रहे थे। उन्होंने अभिनय छोड़कर एबीसीएल का गठन किया था और फिल्म निर्माण जैसे काम शुरू किये थे। अपनी इस पारी में उन्हें एकदम असफलता हाथ लगी और वे करोड़ों के कर्ज में डूब गए। सोनिया ने उस बुरे दौर में अमिताभ की कोई सुध नहीं ली। रिश्ते बनाने में माहिर अमर सिंह उस समय अमिताभ के करीब आए और हरसंभव मदद भी की। अमिताभ ने भी हार नहीं मानी और अभिनय की दुनिया में फिर लौट आए। कौन बनेगा करोड़पति के साथ ही उनकी लोकप्रियता फिर लौट आई और वे फिर चल पड़े। इधर, जया-अभिषेक ने भी अभिनय कर पैसा कमाया और इस तरह परिवार की मेहनत और एकजुटता से बुरे दिन गुजर गए।
अमर सिंह उस दौर के अमिताभ के साथी रहे हैं। ऎसे में जब अमर सिंह बुरे दौर से गुजर रहे हैं, तो निश्चित रूप से अमिताभ को उनका साथ देना ही चाहिए था। लेकिन जब जया ने अमर सिंह के साथ पार्टी नहीं छोड़ी तो निसंदेह अमर सिंह को काफी तकलीफ हुई और उन्होंने इसे मौके-बेमौके जाहिर भी किया। जब जया को फिर से समाजवादी पार्टी का टिकट मिला तो अमर िंसह ने खासी तल्ख प्रतिक्रिया दी थी। जया बच्चन ने राज्यसभा टिकट लौटाकर अपने परिवार की चिर-परिचित संजीदगी का परिचय दिया है। हालांकि यह नहीं माना जा सकता है कि केवल टिकट लौटाने मात्र से ही बच्चन परिवार और अमर सिंह के रिश्तों में पड़ी दरार पट जाएगी लेकिन जया बच्चन ने एक बार फिर यह तो साबित कर ही दिया है कि वे इतनी सत्तालोलुप नहीं हैं कि कोई भी आरोप स्वीकार कर स्वार्थों से चिपकी रहे।

Wednesday, May 19, 2010

कामयाबी का एवरेस्ट फतह करने वाले के लिए कौनसा लक्ष्य मुश्किल है ?

आज से ठीक एक साल पहले 20 मई 2009 बुधवार को सवेरे 6 बजकर 15 मिनट पर चूरू के गौरव शर्मा ने एवरेस्ट फतह कर एक इतिहास रचा था। विपरीत परिस्थितियों से लगातार लोहा लेते हुए खुद को बनाने वाले गौरव की यह सफलता उस संकल्प की जीत थी, जो उन्होंने तमाम मुश्किलों और बाधाओं के खिलाफ किया था। इस एक साल में गौरव को बड़ी संख्या में समारोहों में सम्मानित किया गया है।
चूरू जैसे शहर में जब गौरव ने आज से करीब एक दशक पहले पर्वतारोहण की गतिविधियों में भाग लेना शुरू करते हुए कहीं एवरेस्ट आरोहण जैसी बात भी की होगी, तो हम कल्पना कर सकते हैं, कि इसे एक मजाक से ज्यादा कुछ और नहीं समझा गया होगा। जिस दिन पहली बार बालक गौरव ने यह सपना देखा होगा, उस दिन किसी और ने शायद ही यह कल्पना की होगी कि यह जिद्दी बालक एक दिन तमाम युवाओं के लिए एक आदर्श बनकर उभरेगा।
अपनी एवरेस्ट विजय की पहली वर्षगांठ पर गौरव ने यह संकल्प किया है कि वे आने वाले समय में विश्व के शेष छह महाद्वीपों के सर्वोच्च पर्वत शिखरों पर अपनी विजय पताका फहराएंगे। एशिया के सबसे ऊंचे शिखर एवरेस्ट पर, जो कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है, वे जा चुके हैं और शेष तमाम महाद्वीपों की शीर्ष चोटियों को वे आने वाले दिनों में अपने कदमों में लाकर रखना चाहते हैं। ये चोटियां हैं - अफ्रीका में माउंट किलिमंजारो, उत्तरी अमेरिका में माउंट मैकेन्ली, यूरोप में माउण्ट एलब्रस, अन्टार्कटिका में माउण्ट विन्सन मेसिफ, दक्षिण अमेरिका में माउण्ट एकॉनकाहुआ और ओसियाना में माउण्ट कार्सटेन्ज। निश्चित रूप से गौरव का यह संकल्प उनके भीतर के लोहे को अभिव्यक्त करने वाला है। कामयाबी का एवरेस्ट छूकर भी गौरव की जिजीविषा उन्हें चैन से बैठने नहीं दे रही।
बहरहाल, कहा जा सकता है कि जिसने एवरेस्ट पर विजय पा ली है, उसके लिए कौनसा लक्ष्य मुश्किल है। बहरहाल, गौरव के हौंसले को सलाम और उनके नए संकल्प की सफलता के लिए उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं... दिल से।

Saturday, May 8, 2010

मा



वातानुकूलित कक्ष में
आरामदेह बिस्तरों पर
गहरी नींद लेते हुए भी
अक्सर सुना है मैंने
तुम्हारी लोरी का संगीत।


रसपूर्ण एवं
स्वादिष्ट भोजन से
तृप्त हो जाने के बाद भी
रोज सुनाई पड़ती है मुझे
उस फूंकनी की आवाज
जिससे जलाकर चूल्हा
तुम सेंकती थी रोटियां।


मेरी गृहवाटिका में खिले
गुलाबों से बिखरी खुशबू
एकदम फीकी है उस गंध से
जिसे पैदा करते थे
कंडे थापते हाथ तुम्हारे।


मा ! सब कुछ शून्य है
अस्तित्वहीन है
तुम्हारे सिवा, तुम्हारे बिना।
बाकी सब रिश्ते
एक और ही गणित से चलते हैं
मगर तुम
बिल्कुल निर्लिप्त हो
उस जोड़-बाकी
गुणा-भाग से।


Friday, April 16, 2010

बधाई !

राजस्थान पत्रिका के चूरू कार्यालय में बतौर संवाददाता कार्यरत युवा पत्रकार भाई विश्वनाथ सैनी को गांवों में जल संरक्षण एवं प्रबंधन विषयक बेस्ट रिपोर्टिग के लिए वर्ष 2009 का ग्राम गदर पुरस्कार दिया गया है। जयपुर के गैर सरकारी संगठन कट्स की ओर से दिया जाने वाला यह पुरस्कार प्रदेश के प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है। युवा पत्रकार भाई विश्वनाथ निश्चय ही एक उत्साही पत्रकार हैं जो समय-समय पर अपनी बेहतरीन खबरों से ध्यान खींचते हैं। जमीन से जुड़े होने कारण सैनी की पत्रकारिता में एक खास प्रभाव है, जो कहीं न कहीं आकर्षित और प्रभावित तो करता ही है और भविष्य के लिए बेहतर संभावनाएं भी जगाता है।
फिलहाल भाई विश्वनाथ को पुरस्कार के लिए ढेर सारी बधाइयां... उम्मीद की जा सकती है कि पुरस्कार के रूप में यह प्रोत्साहन उन्हें अधिक बेहतर पत्रकारिता के लिए नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

Thursday, April 8, 2010

कोई स्त्री ही होगी वह...

दिनभर तुम्हारे लिए चिंतातुर
तुम्हारी मा हो सकती है वह
और तुम्हारी मुसीबतों के सामने
दीवार बनकर खड़ी बड़ी बहिन भी।

यह भी संभव है कि वह हो
अपने झुर्रियों भरे हाथों को
तुम्हारे सुखों के लिए
फैलाए खड़ी बूढ़ी दादी मा,
स्नेहिल हाथों से घी-चूरमा परोसती
और अपनी कहानियों के जरिये
अपने अनुभव के हाथ तुम्हारे सिर रखती
तुम्हारी नानी,
तुम्हारे हर दर्द-तकलीफ में
कंधा मिलाकर खड़ी पत्नी,
तुम्हारे साथ सुनहरी जिंदगी के
सपने बुनती प्रेमिका
या तुम्हारे घर-आंगन में
किलकारियां भरती नन्हीं-नटखट बिटिया ।

हां, तुम्हारी स्लेट-पेंसिल थामे
ककहरा सिखाती
तुम्हारी स्कूल टीचर भी हो सकती है वह।

भले ही कोई भी हो वह
ये मेरा दावा है
कि जिसने सबसे ज्यादा प्यार
और सबसे ज्यादा खुशियां दी हैं तुम्हें,
तुम पर निछावर किए हैं
अपने सुख-अपना जीवन
यकीनन कोई स्त्री ही होगी वह.

जरा सोचो
स्त्री होने की एवज में
उसे तुम्हारी इस दुनिया में
दाखिल होने से ही
रोक दिया गया होता तो...
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Tuesday, March 23, 2010

बचपन को समर्पित तीन लघु कविताएं

(एक)

स्मृति-शेष

बचपन की
स्मृतियों में ही शायद
अपने भीतर
ढेर सारा बचपना
संजोये हुए हैं लोग ।


(दो)

दोहराव

बचपन के
दिनों को
याद करते हुए
आज मैंने सोचा
कि खुद को
दोहराने वाला
इतिहास आखिर
हमें क्यों नहीं दोहराता ?


(तीन)

भरपाई

बचपन
नहीं आयेगा
लौटकर
इस दुःख को
कम करने के लिए
क्या पर्याप्त नहीं है
यह सुख
कि हम भी
कभी बच्चे थे...।

-कुमार अजय

Saturday, March 13, 2010

समीक्षा - पंछी की पुकार (कविता संग्रह)

पंछी की हर कविता एक मुद्दा है
देश की आजादी से महज एक-डेढ साल पहले जन्मे 64 वर्षीय वरिष्ठ कवि संतोष कुमार ने बेशक देश की अब तक जिंदगी में आए विभिन्न आर्थिक, सामरिक व राजनीतिक संकटों और इन सबके बीच दो जून की रोटी के लिए जूझते आम आदमी की जिंदगी में आ रहे नित नए बदलावों के एक युग को जीया है। यही वजह है कि उनका काव्य संग्रह ‘पंछी की पुकार’ देश और परिवेश की दुर्दशा से दुखी एक देशप्रेमी आम आदमी का व्यथा काव्य है। आज हम और हमारा देश जिन चुनौतियों से हर क्षण दो-चार हो रहे हैं, पंछी ने अपने काव्य चिंतन में उन तमाम चुनौतियों को बेहतर ढंग से दर्ज किया है और सबसे ज्यादा उम्मीद जगाने वाली बात यह है कि वे इन चुनौतियों और चिंताओं के यथार्थ को केवल अभिव्यक्त ही नहीं करते, अपितु इनके निदान भी सुझाते हैं, शर्त महज यह है कि हम समाधान के लिए तैयार हों।
संग्रह की कविताओं में व्यक्ति की रोजमर्रा की समस्याओं से लेकर देश की राष्ट्रव्यापी समस्याओं को एक-एक कर आवाज दी गई है। कवि हृद्य में जहां एक तरफ देश की संप्रभुता, स्वतंत्रता, गणतंत्र, गौरवपूर्ण संस्कृति और सुनहरे इतिहास के प्रति विराट गर्व की भावना है, वहीं मौजूदा दौर की समस्याओं और देश के रहनुमाओं के चरित्र को लेकर एक शिकायत व पीड़ा का भाव भी गहरे तक दर्ज है। भुखमरी, गरीबी, शराबखोरी, पर्यावरण प्रदूषण, बेरोजगारी, बालश्रम, दहेज, विवाह में फिजूलखर्ची और कन्या भ्रूण हत्या से लेकर आतंकवाद, जातिवाद, धर्मांधता और जहरीली सियासत सरीखी वह कौनसी समस्या और चुनौती है, जिसे लेकर कवि ने ध्यान खींचने की कोशिश नहीं की हो। संग्रह की पहली ही कविता ‘देश की एकता खतरे में’ से ही कवि अपने इरादों से अवगत करा देता है जब वह आतंकवाद और अलगाववाद के ज्वलंत प्रश्न को उठाते हुए राष्ट्रीय एकता व अखंडता को बनाए रखने का संदेश व्यक्त करता है। अगली कविता ‘गणतंत्र तुमसे नमन करूं’ में कवि अपने राष्ट्रपे्रम को स्वर देते हुए देश के लिए बलिदान हुए शहीदों को पूरी शिद्दत के साथ याद करता है।
कवि के अंतस में गांव की गलियों में बीते बचपन के साथ पीपल, पनघट, धूणी, गोधूलि बेला में बजती गायों और बैलों की घंटियों, भोर की चक्की, मुर्गें की बांग और चिड़ियाओं के शोर का मधुर स्मरण है, वहीं क्षण-क्षण घटित हो रहे बदलाव से संक्रमित होते संस्कारों की गहरी तकलीफ भी है। कवि को बदलाव की यह आंधी रास नहीं आ रही क्योंकि इन बदलावों में जो कुछ कवि को अच्छा और सुकून देने वाला है, उसे बदल दिया जा रहा है और सबसे ज्यादा पीडाजनक यह कि कवि सिवाय अपनी पीड़ा को कविता में अंकित करने के कुछ भी नहीं कर पा रहा है। मोबाइल का अतिप्रयोग और फूहडता से भरे फैशन सहित तमाम तथाकथित आधुनिकताएं कवि को परेशान करती हैं।
देश वर्तमान में जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, तेजी से बढ़ती आबादी उनमें से बहुत समस्याओं की जननी है। यही वजह है कि कवि की कई कविताएं परिवार नियोजन और छोटा परिवार के संदेश को समर्पित हैं। देश के आम आदमी की तरह कवि भी कहीं न कहीं नेताओं को जिम्मेदार समझता ही है और इन आम अपेक्षाओं पर जरा भी खरे नहीं उतरने वाले आज के नेताओं की बड़ी ही खराब छवि कवि के नाजुक हृद्य में अंकित है।
हो भी क्यों नहीं, कवि उस युग की सियासत का गवाह है जो गांधी, नेहरू और शास्त्री जैसे गौरवमयी व्यक्तित्वों से गरिमा पाती थी। नेताओं के प्रति कवि की यह भावना अभिव्यक्त हुए बिना नहीं रहती। देश की आजादी, एकता और स्वाभिमान के लिए बलिदान हो जाने वाले उन महान जननायकों की तुलना जब कवि वर्तमान दौर के सत्तालोलुप, भ्रष्ट और सिद्धांतहीन खलनायकों से करता है तो इस तरह की अभिव्यक्ति स्वाभाविक ही है। नेताओं के लिए गिरगिट की तरह रंग बदलते, खिसियानी हंसी हंसते, कान पकड़ते, नाक रगड़ते, और पूंछ हिलाते जैसे मुहावरों और मारने झोटे, बिन पैंदे के लोटे, आस्तीन के सांप जैसे विशेषणों का प्रयोग कवि हृद्य में जन्मी उसी घृणात्मक प्रतिक्रिया की पैदाईश है।
भारतीय इतिहास की गौरवमयी नारियों का स्मरण कर कवि ने जहां नारी विमर्श को स्वर दिया है, वहीं पाश्चात्य संस्कृति और फैशन के अंधानुकरण में भटकी आज की नारी को राह दिखाने का प्रयास भी ‘पंछी’ ने किया है। ‘किसान की पीड़ा’ में कवि ने दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज देश के कृषक वर्ग की व्यथा को स्वर देते हुए उसे बच्चो को पढाने और परिवार नियोजन अपनाने जैसे संदेश भी दिए हैं तो ‘बेरोजगारी और निराशा’ कविता में डिग्रियों के संग्रह के बावजूद बेकार घूमते युवाओं को स्वरोजगार अपनाने की बात कही है। ‘कौमी एकता से पहले घर की एकता’ के जरिए कवि ने सुधी पाठक की दुखती रग को तो छेड़ा ही है, बड़ी बड़ी बातें बनाने वाले समाज के ठेकेदारों को आईना भी दिखाया है। अपनी एक रचना में बाढ़ का चित्रण करते हुए इस आपदा की घड़ी में भी फोटो खिंचवाकर पिकनिक मनाते लोगों और हेलीकाप्टर से दौरे करते नेताओं पर सटीक कटाक्ष किया है। ‘जीवन का चक्कर ’ कविता में आम आदमी की जिंदगी में मौजूद विडंबनाओं और विसंगतियों का प्रभावित करने वाला चित्र है तो ‘राजनीति और राम’ कविता में दिन दिन काले पड़ते जा रहे लोकतंत्र के चेहरे की तस्वीर खींचने की कोशिश की है। ‘फागुन की मस्ती और होली’ कविता मेें रंग, चंग और हुड़दंग से भरपूर अल्हड़पन है तो फूली सरसों, गेहूं की लहराती बालियों, पंछियों के राग, हंसी ठिठोली और पिचकारी के जरिए उल्लास, खुशहाली और समृद्धि का संदेश भी मौजूद है। स्काईलैब, आपातकाल, बाढ़, अकाल, इंदिरा गांधी की हत्या जैसी समकालीन घटनाओं पर प्रतिक्रिया का अंदाज कवि के युग बोध और चेतना को अभिव्यक्त करता है। अनेक रचनाओं में जीवन, कर्म, अहिंसा, सत्य और धर्म का मर्म समझाते कवि का दार्शनिक रूप मानव के रूप अनेक कविता में मुखर होकर सामने आता है, जब वह कहता है - ‘‘ कहीं पथ में तेरे सुमन खिले, कहीं पथ में तेरे कांटे हैं, कहीं शोर मचा है महलों में, कहीं मरघट के सन्नाटे हैं। ’’
कुल मिलाकर वर्तमान समय की व्यक्तिगत विडंबनाओं और सार्वजनिक विसंगतियों-विद्रूपताओं पर करारी चोट करती ये रचनाएं दरअसल कविता नहीं मुद्दे हैं। ‘पंछी’ की हर कविता एक मुद्दा है, एक संदेश है, जिससे मुंह छिपाकर हम और आप ज्यादा देर तक नहीं रह सकते। बहरहाल, पंछी की पुकार के लिए कामना की जा सकती है कि बात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगी।
-कुमार अजय
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Wednesday, February 24, 2010

मायड़ भाषा के लिए समर्पित एक प्रवासी का आयोजन

निसंदेह यह एक अनूठा आयोजन था... अक्सर जिस तरह के कार्यक्रमों से सामना होता है उनसे खासा अलग। अलग इस मायने में कि इस आयोजन में औपचारिकताएं हावी नहीं... औपचारिकताएं थीं तो जरूर लेकिन आयोजन के सूत्रधार की विराट भावनाओं में कहीं दबी हुई मात्र। आमतौर पर इस तरह के समारोह खुद को ही प्रतिष्ठित करने के साधन मात्र होते हैं लेकिन यहां ऎसा कुछ नजर नहीं आया। आयोजक श्री नरेंद्र कुमार धानुका पूरे समारोह में साहित्य और साहित्यकारों के एक सेवक की तरह दौड़-धूप और खिदमत करते दिखे। आयोजन में मौजूद एक-एक सृजनधर्मी को खुद दौड़कर पूरी आत्मीयता से गले से लगाकर गद्गद् कर दिया।

धानुका सेवा ट्रस्ट की ओर से पिछले कई बरस से आयोजित किया जा रहा सरस्वती सेवा सम्मान समारोह पिछले दिनों विश्व मातृभाषा दिवस पर 21 फरवरी 2010 रविवार को फतेहपुर के त्रिवेणी भवन में आयोजित हुआ। मुझे भी साहित्यिक मित्रों सहित समारोह में शामिल होने का सौभाग्य मिला। धानुका जी जैसे साहित्यप्रेमी से मिलकर खुशी हुई। वर्ष 2008 के लिए सीकर के डॉ गोरधन सिंह शेखावत को तथा वर्ष 2009 के लिए बीकानेर के डॉ मदन सैनी को सरस्वती सेवा सम्मान दिया गया। चूरू के वयोवृद्ध साहित्यकार श्री बैजनाथ पंवार को विशिष्ठ पुरस्कार ‘मानुष तनु’ से सम्मानित किया गया तो ‘बसंती देवी धानुका युवा साहित्यकार पुरस्कार’ से मेरे अग्रज समान दुलाराम सहारण सम्मानित हुए।
समारोह के मुख्य अतिथि राजस्थानी व हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ चंद्र प्रकाश देवल ने सुनने वालों की आत्मा को झकझोर देने वाला व्यक्तव्य दिया। ठेठ राजस्थानी भाषा में डॉ देवल ने कहा, ‘इक्कीस फरवरी को यूएनओ द्वारा मातृभाषा दिवस इसलिए घोषित किया गया है क्योंकि इस दिन बंगला भाषा के लिए 7 लोगों ने अपना बलिदान दिया था और 29 लोग घायल हुए थे। गौर करने वाली बात है कि भाषा के सवाल पर ही बांग्लादेश की नींव रखी गई। हम भी अपनी भाषा को सहेज सकें, इसके लिए जरूरी है कि मायड़ भाषा का मंदिर बने, जहां आकर लोग झुकें तभी मान्यता मिलेगी।’
डॉ देवल ने कहा, ‘सवाल है कि रवींद्रनाथ क्यों बड़े हैं? इसलिए कि नोबल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद भी उन्होंने बाल साहित्य रचा। बांग्ला नहीं होती तो रवींद्र नहीं होते और रवींद्र नहीं होते तो आज बांग्ला जितनी समृद्ध है, उतनी नहीं होती। लेखक अपनी भाषा को और भाषा अपने लेखक को समृद्ध करती है।’
रवींद्र नाथ को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि शेर की खाल बहुत सुंदर होती है, इसलिए उससे घर को सजाया जा सकता है, पूजा के समय उस का आसन बनाया जा सकता है लेकिन हम अपने शरीर की खाल से तो उसकी अदला-बदली नहीं कर सकते हैं। इसी प्रकार मायड़ भाषा की तुलना दूसरी किसी भाषा से नहीं की जा सकती है। यूं तो हम अपने घर में राजस्थानी बोलते हैं और जब वास्तव में हमें अपनी बात कहने का अवसर और मंच मिलता है तो हम हिंदी में शुरू हो जाते हैं।
उन्होनें कहा कि पुरस्कार के बाद लेखक की नैतिक जिम्मेदारी बढ जाती है कि वह अपने सार्थक सृजन से समाज को दिशा दे। राजस्थानी भाषा की मान्यता को उन्होंने राजस्थानियों की अस्मिता का सवाल बताते हुए कहा कि भाषा नहीं तो संस्कृति नहीं और बिना संस्कृति के हमारी कोई पहचान नहीं। उन्होंने कहा कि इस बात को ध्यान रखें कि हम भारतीय हैं, इसलिए राजस्थानी नहीं है अपितु राजस्थानी हैं, इसलिए भारतीय हैं। इसलिए अपने राजस्थानी होने को बचाएं, भारतीयता अपने आप बची रहेगी। उन्होंने कहा कि राजस्थानी की मान्यता के आंदोलन को जन आंदोलन बनाना होगा।
मायड़ भाषा में उत्कृष्ट साहित्य सृजन पर भी बल देते हुए श्री देवल ने इस मौके पर राजस्थानी लेखकों का आह्वान किया कि मान्यता तो संवैधानिक एवं राजनैतिक प्रश्न है और वह एक दिन मिलनी ही है। लेकिन केवल मान्यता नहीं होने के बहाने राजस्थानी के लेखक अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। उन्होंने कहा कि कम से कम राजस्थानी में कोई रवींद्र नाथ तो पैदा हो, कोई कालिदास तो पैदा हो जो विश्वस्तरीय साहित्य की रचना करे, लिखने से कौन रोक रहा है। बंगाली में रवींद्र नाथ टैगोर जैसे साहित्यकार हुए हैं, जिनकी विद्वता से प्रभावित होकर अंग्रेजों को कहना पड़ा था कि आपको देखकर लगता है कि हिंदुस्थान को अब आजाद होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि केंद्रीय साहित्य अकादेमी में राजस्थानी भाषा को मान्यता है, वह काम भी किसी राजनेता या राजस्थानी व्यक्ति का नहीं है। अद्भुत सी बात है कि राजस्थानी को यह गौरव 1975 में एक बंगाली सुनीति कुमार चटर्जी ने दिलाया क्योंकि उन्होंने राजस्थानी का अध्ययन कर पाया था कि राजस्थानी एक वैज्ञानिक भाषा है जिससे उचित महत्व मिलना ही चाहिए।
उन्होंने कहा कि नरेंद्र कुमार धानुका का काम धर्म और तपस्या से छोटा काम नहीं है। धानुका जी ने जिस तरह से दिल खोलकर स्वागत किया, उससे दिल खुश हुआ। लेखकों का भी दायित्व है कि वे अपना कर्ज उतारें और रचनात्मक व सार्थक लेखन से समाज को दिशा दें। साहित्यकारों का दिल खोल कर अभिनंदन करने वाले नरेंद्र जी जैसे लोग तो इज्जत करते रहेंगे, इनकी तो यह विनम्रता है लेकिन हमारी भी यह जिम्मेदारी है कि इस स्वागत, अभिनंदन और इनके द्वारा दिए जा रहे विशेषणों के योग्य होकर दिखाएं। लेखक की अपनी जिम्मेदारी है कि वह वापस समाज को कितना रचनात्मक दे सकता है। धानुका ट्रस्ट की भावना को समझने की जरूरत है। धानुका जी ने इस मातृभाषा दिवस के दिन को वाकई त्योहार बना दिया है, इनसे प्रेरणा लेकर कुछ तो प्रण लो। उन्होंने अतिशयोक्ति और अतिरेक भरे प्रशस्ति पत्रों पर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि इस तरह की भाषा रचने वाला तो दोषी है ही, ऎसी प्रशस्ति को सुनने वाले को भी पाप लगता है और लेखक के भटकने का खतरा रहता है।
कबीर का ‘सुखिया सब संसार है खावै अर सोवै , दुखिया दास कबीर है, जागै और रोवै।’ दोहा उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि सारी जिम्मेदारी उनकी है, जो मायड़ भाषा और अपनी संस्कृति की पीड़ समझते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि लेखक आगे बढें, लिखें और साहित्य में श्रीवृद्धि करें, अपना कर्ज उतारें तभी भाषा की तरक्की होगी।
विभिन्न उद्धरणों के साथ उन्होंने कहा कि भाषा की क्षमता अद्भुत है और भाषा ही हमारा जीवन प्राण आधार है। भाषा के साथ हमारा नाळ का संबंध है। हमारी अस्मिता का आधार है भाषा, भाषा नहीं तो संस्कृति नहीं और संस्कृति नहीं तो फिर क्या है हमारे पास। प्रवासियों का भी इस भूमि और भाषा से नाळ का संबंध है। उनका इस भूमि से जुड़ाव भी है। प्रवासियों को एक मंदिर मायड़ भाषा का बनाना चाहिए। वहां पर लोग झुकेंगे तो निश्चित ही भाषा के लिए एक जागरुकता भी आएगी।
श्री देवल ने कहा कि राजस्थान के लोकगीतों में सर्वाधिक वियोग है क्योंकि विरह राजस्थानियों के अवचेतन में भरा पड़ा है। वह वियोग है अपनी भाषा, संस्कृति और भूमि छूटने का। राम-विभीषण प्रसंग के साथ ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा को पहने बिना हम नंगे हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि बालक पांच साल की आयु तक 80 प्रतिशत सीख जाता है लेकिन हमारे यहां तो विद्यालय में जाते ही बच्चे का सामना अजनबी भाषा से होता है और उसके विकास में एक व्यवधान पैदा होता है। बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा उसकी मातृभाषा में ही होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पहले मुगलों ने 500 साल राज किया, अदालती कामकाज की भाषा में हम इसका प्रभाव देख सकते हैं। फिर 200 साल तक अंग्रेजों का शासन रहा, उन्होंने अंग्रेजी हम पर थोपी। सवाल है कि इन विपरीत हालात में राजस्थानी भाषा जिंदा कैसे रही। उन्होंने कहा कि राजस्थानी उन महान अनपढ लोगों के कारण जिंदा रहीं, जिन्हें लिखना पढना नहीं आया।
भाषायी संक्रमण की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि रेल अपने साथ कितने ही शब्द लेकर आई मसलन... स्टेशन, सिग्नल, प्लेटफार्म, टीटी। इसी तरह कम्प्यूटर की भी अपनी भाषा है। एक कम्प्यूटर को तो हम अपनी भाषा में कुछ भी कह लें लेकिन माउस को क्या करेंगे। इसलिए इससे चिंतित होने की जरूरत नहीं है, यह बदलाव तो चलता ही रहता है।
समारोह के प्रधान वक्ता राष्ट्रभाषा हिंदी प्रचार समिति श्रीडूंगरगढ के संस्थापक अध्यक्ष श्री श्याम महर्षि ने भी राजस्थानी की मान्यता की मांग जोरदार ढंग से उठाते हुए कहा कि जब तक भाषा रोजी-रोटी से नहीं जुडे़गी, तब तक उसका अस्तित्व बचाए रखना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि धनार्जन की मजबूरी में परदेस जाना जरूरी है लेकिन प्रवासी अपनी जन्मभूमि और मातृभाषा को नहीं भूलें। जन्मभूमि पर जिस का घरौंदा नहीं, उसकी कोई पहचान नहीं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक पुरस्कार लेखक को यह जिम्मेदारी सौंपता है कि वह पुरस्कार की गरिमा का ख्याल करते हुए समाज के लिए उपयोगी लेखन करे। उन्होंने कहा कि यह सुखद स्थिति है कि हिंदी को छोड़ दें तो देश में राजस्थानी भाषा में किसी भी भाषा से अधिक पुरस्कार है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन राजस्थानी और जूनी गुजराती में कोई अंतर नहीं लेकिन बड़े नेताओं की गलती के कारण राजस्थानी खामियाजा भुगत रही है और गुजराती को गांधी-पटेल मिले तो वह आज बेहतर स्थिति में है।
उन्होंने कहा कि राजस्थानी सहित 36 भाषाओं को मान्यता की बात हो रही है लेकिन राजस्थानी को 36 भाषाओं में शामिल करना भी बेइंसाफी ही है, राजस्थानी को इसकी विशेषताओं के कारण सर्वप्रथम मान्यता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राजस्थानी का आंदोलन कभी जन आंदोलन नहीं बन सका, इसलिए राजस्थानी आज उपेक्षित है। उन्होंने कहा कि मान्यता का सवाल केवल लेखकों के लिए नहीं, यह 8 करोड़ लोगों के हक की लड़ाई है।
आयोजक ट्रस्ट के श्री शंकरलाल धानुका ने कहा कि राजनेताओं की बेरूखी के कारण राजस्थानी भाषा उपेक्षित है। इसलिए राजस्थानियों को यह संकल्प करना होगा कि वोट उसी को देंगे जो राजस्थानी भाषा के हित की बात करेगा, जो मान्यता की बात करेगा।
साहित्यकार हनुमान दीक्षित ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि भौतिक एवं शब्द सृष्टि के समन्वय से यह संसार चल रहा है लेकिन भौतिक सृष्टि नष्ट हो जाती है, शब्द सृष्टि शाश्वत है। उन्होंने कहा कि महाभारत की तमाम निशानियां आज मिट गई होंगी, वेदव्यास ने कहां बैठकर लिखा होगा, वह स्थान भी उपलब्ध नहीं लेकिन महाभारत और गीता आज भी जिंदा हैं। समारोह में विशिष्ठ अतिथि राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के पूर्व अध्यक्ष सीताराम महर्षि, प्रसिद्ध आलोचक डॉ किरण नाहटा, श्री बैजनाथ पंवार, श्री दुलाराम सहारण, श्री मदन सैनी, श्री गोरधन सिंह शेखावत ने भी संबोधित किया। आयोजक ट्रस्ट के श्री नरेंद्र कुमार धानुका ने आभार जताया। संचालन डॉ चेतन स्वामी ने किया। समारोह के दौरान डॉ रामकुमार घोटड़ द्वारा संपादित पुस्तक ‘देश-विदेश की लघुकथाएं’ तथा श्री शिशुपाल सिंह नारसरा व श्री गोरधनसिंह शेखावत की पुस्तक ‘गांव की चौपाल एवं अन्य एकांकी’ का विमोचन किया गया। इस दौरान राजस्थानी के वरिष्ठ कवि श्री भंवर सिंह सामौर, श्री सीताराम महर्षि, श्री शंभूप्रसाद केड़वाल ने कविता पाठ किया। पूर्व जिला प्रमुख सांवरमल मोर ने अतिथियों को प्रतीक चिन्ह भेंट किए।
कार्यक्रम में केसरी कांत ‘कांत’ पं. उमाशंकर, विश्वनाथ भाटी, सुधींद्र शर्मा सुधि, कमल शर्मा, देवकरण जोशी दीपक, उम्मेद गोठवाल, उम्मेद धानियां सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, रचनाकार व नागरिक मौजूद थे।
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Tuesday, February 16, 2010

ये जिंदगी मिरा निजी हादिसा है...

मिरे जख्मों से तुझे तकलीफ क्या है
ये जिंदगी तो मिरा निजी हादिसा है।

तुझे भी आगाह तो करता चलू रकीब
ये बर्बादियां मिरे इश्क की सजा है।

तुझे भी मिल जाए कोई तिरे जैसा
बेवफा साथ तिरे मिरी ये दुआ है।

जिंदगी मैं तुझसे नहीं डरने वाला
बता पास तिरे दर्द से ज्यादा क्या है।

रात-रातभर जख्म चिल्लाते हैं मिरे
तू बेवफा है, बेवफा है, बेवफा है।
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Sunday, January 24, 2010

तेरे खंजर से दोस्ती कर ली...

मेरी आंखों में जो पानी है
फकत आपकी मेहरबानी है।

जिंदगी मुमकिन नहीं तुम बिन
लोग कहते हैं, साफ नादानी है।

तेरी महफिल में एक बार फिर
मुझे तकदीर आजमानी है।

तेरे खंजर से दोस्ती कर ली
दिल ने भी क्या खूब ठानी है।

दिखा तो देते जन्नत एक बार
जब तय है कि जान जानी है।
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Tuesday, December 29, 2009

नये साल की मुबारकबाद


बढ़ी हुई शेव के साथ
बिस्तर पर
औंधे मुंह पड़े हुए
बावजूद अनिच्छा के
नये साल में घुस रहा हूं,

ख्वाबों की खूबसूरती में
गुजरे हुए कल
और
अतीत की तरह सुनहरे
भविष्य की उम्मीदों को
किनारे करके
वर्तमान सवार है
मेरी पीठ पर
सच सी निर्ममता लिये।

दोस्तो !
तुम नहीं जानते शायद
कि तुम्हारी दुआएं
महज मजाक हैं
खुद को
और मुझे
बहलाने की कोशिश भर।

यदि नहीं तो फिर
सारे मिलकर
शोकग्रस्त हो जाओ
गुजरे हुए उस साल के लिए
जो कभी आया था यकीनन
नये साल की तरह
हम सभी की जिंदगी में ।
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Friday, December 25, 2009

मेरी एक और ग़ज़ल


वेतन बढे, छोटे मकान हो गए...

सुविधाओं के ही घमासान हो गए
वेतन बढे, छोटे मकान हो गए।

दूर अपनों से इस कदर हुए
बिना क्षितिज के आसमान हो गए।

जिंदगी और मौत भी प्यारी लगीं
प्यार में दोहरे रूझान हो गए।

उल्फत में निकले लब्ज जाने कब
रामधुन-कीरतन-अजान हो गए।

मुश्किलें इस कदर पड़ी मुझ पर
जिंदगी के मसले आसान हो गए।

जिनमें सबकी अपनी अपनी कब्रे हैं
नाजुक आशियाने ही श्मसान हो गए।
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Sunday, December 20, 2009

कुमार अजय की एक ग़ज़ल


उसने मुझ पर उछाले पत्थर
मैंने बुनियाद में डाले पत्थर।

तेरी राह में हर मील पे गड़ा हूं
तेरी औकात है तो हिला ले पत्थर।

मेरी तो आदत है सच कहूंगा ही
तू हाथों में लाख उठा ले पत्थर।

हर पत्थर सजदे में झुका है
उसने कुछ ऐसे हैं ढाले पत्थर।

बुरे दौर में रोटी की बात न कर
तलब है तो पी ले पत्थर, खा ले पत्थर।


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